तेरा मुहल्ला

Shying away from the eyes of society and making tip toed gait towards the window of his love. Nervous that her mother might wake up, he innocently sings his heart out. He is no Romeo. He is not Beethoven. Two souls are grieved by the distance between them. Standing on the other side of her neighborhood, one of them hums the following

कुछ सौ दौड़ दूर जो तेरा ये घर है।
और एक याद पार तू जो खड़ी है। बिखरी हुई है चेहरे पे
वही जनवरी की मुस्कान।
मैं भी पास ही हूँ।
तुम्हे क्या लगा , खुद-ब -खुद खुल जाता है तुम्हारे बालों का पिन?
आस-पास ही हूँ।
तेरी हर सांस में मेरा जन्म होता है। हर आह में अंत।
तेरे सर पे फेरता हूँ एक एहसास। महक तेरी रोमों में समेट।
फिर कूद जाता हूँ खिड़की के उस ओर । शायद ये परदे मेरी चुगली कर देंगे।
मेरे आने का अंदेशा तो तुम्हे भी हो गया था , क्यूँकी
मेरे जाते ही जब तुमने उस हंसी को एक आईने में उतारी
तुमने झाँका और पाया
दूर किसी कोने में , गुलदस्ते से सटी हुई
दरवाज़े की ओट में , एक टंगी हुई मेरी परछाई।
Neighbourhood
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