लाल गुलाब और श्वेत हंसिनी

हाँ , मैं रंग हूँ।
वही जिन्हें रेखाओं में प्रतिबद्ध कर
तुम केहते हो
“फैलो…….
और श्रृंगार करो ”

तेरे चित्र जीवंत हो उठे
अमर हो गयी उनकी जीवनी
पूर्ण हुआ उद्देश्य मेरा। मुबारक तुम्हे
तुम्हारे लाल गुलाब और श्वेत हंसिनी

सोचता हूँ कभी-कभी
इन आकारों के भीड़ के पार
क्या कोई आसमां होगा ?
और होगा तो किस रंग में ढलेगा ?
क्योंकि रंग तो मैं हूँ। और मैं इधर हूँ। रेखाओं के इस पार।

जाऊंगा भी कहाँ ?
लौट आऊंगा
तेरे चरस के आदेश पे
और रेखाओं में प्रतिबद्ध कर
तुम फिर कहोगे
“फैलो…….
और श्रृंगार करो ”

और मैं करूँगा।

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